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बुधवार, 14 जुलाई 2010

हाँ मै अपना बदन बेचूं

हर किसी की नज़र मेरे बदन पर है,
कसूर इन नजरों में किसका क्या देखूं !

मजबूरी-ए-हालतें-दौर में खड़ी होकर मै, 
जमाने में क्या बुरा और अच्छा क्या देखूं !

मेरा भूत पेट सताता है मुझको और फिर मै,
रोता-बिलखता कैसे अपने पेट का टुकड़ा देखूं !

रोज सामना होता है मेरा भूख और गरीबी से ,
फिर ये जमाना क्यों बिगड़े,जब बदन मै अपना बेचूं !

किस्मत का खेल देखिये तो सही हालात ये है ,
मजबूरन बिस्तर पर रोज सुहाग एक नया देखूं !

बार-बार चलना है जब इस राह पर तो यहां ,
चलकर गिरना फिर गिरकर गिरना क्या देखूं !

कुछ पा लिया तो खोने का डर कैसा ,
वक्त गया तो मै वक्त का क्या देखूं !

मेरी मजबूरियों ने मुझे लुटा तो क्या लूटा ,
अपनी हर मजबूरी में मै मजबूर-ए-हालात देखूं !

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