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रविवार, 14 फ़रवरी 2010

kho baitha hui mai

क्या सोचकर माँगा उसने किनारा मुझसे मजधार में ,खुद ही मजधार को किनारा समझे बैठा हूँ मै !
चलने के तक्क्लुफ़ के लिए कहने लगा वो शक्स मुझसे जिसकी याद  में चलने  का सलीका  भूल बैठा हूँ मै !
अपने आंचल में पनाह दी उसने जिस मुसाफिर को ,उसी से उसकी ज़िन्दगी और मौत का सोदा कर बैठा हु मै !
लेखनी चलती थी धरा-धर जिस कागज़ पर ,उस कागज़ को कब से खो बैठा हु मै.


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