क्या सोचकर माँगा उसने किनारा मुझसे मजधार में ,खुद ही मजधार को किनारा समझे बैठा हूँ मै !
चलने के तक्क्लुफ़ के लिए कहने लगा वो शक्स मुझसे जिसकी याद में चलने का सलीका भूल बैठा हूँ मै !
अपने आंचल में पनाह दी उसने जिस मुसाफिर को ,उसी से उसकी ज़िन्दगी और मौत का सोदा कर बैठा हु मै !
लेखनी चलती थी धरा-धर जिस कागज़ पर ,उस कागज़ को कब से खो बैठा हु मै.
अपने आंचल में पनाह दी उसने जिस मुसाफिर को ,उसी से उसकी ज़िन्दगी और मौत का सोदा कर बैठा हु मै !
लेखनी चलती थी धरा-धर जिस कागज़ पर ,उस कागज़ को कब से खो बैठा हु मै.
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