एक ही फूल पर कईयों को लड़ते देखा है मैंने !
यूँ तो मुझे भी डर है गुलशन-ए- शबाब का,
जिसे रुक-रुक कर बार-बार देखा है मैंने!
इस सच्चाई से मुंह छिपाया जाये भी तो कैसे,
पहली बार किसी दिल को घायल कर के देखा है मैंने !
चेतना आई तो यह हकीकत थी फिर सामने मेरे,
हर युगल पर समाज कि उठती उँगलियों को देखा है मैंने!
तुम खरीदने आई हो या बेचेने प्यार मेरा या अपना ,
बड़े-बड़े खरीदारों को यहां बिकते देखा है मैंने !
एक ही फूल को कई बागों में खिलते देखा है मैंने ,
एक ही फूल पर कईयों को लड़ते देखा है मैंने!
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