हार-जीत का सिलसला ही मंजिल कोई दिखायेगा,
आओ देखे अगला मंज़र हमको क्या सिखलाएगा!
जाग कर काटी है ना जाने राते कितनी ,
इन आधी-अधूरी रातो का कौन हिसाब दिलाएगा !
आएगा कही से माँ कि लोरियों का कोई झोखा ,
उन लोरियों का हम सब पर ये कर्म फरमाएगा !
आज भी ताजगी लगेगी माँ कि हर फटकार में,
माँ के प्यार को ना बाँट कोई पायेगा !
पिता-पुत्र कि गुफ्तगू के अहसास को महसूस करो ,
समेट लो उन नसीहतों को घर जिनसे बसाया जायेगा !
भाई-भतीजा आस-पड़ोसी सब तो तेरे अपने है ,
तोड़ कर रिश्ता इनसे मिल तुझको क्या जायेगा!
फसेगी जब कभी मज्ह्धार में नैयेया तेरी
इन्ही में से कोई एक नाखुदा बन आएगा !
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