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शनिवार, 13 नवंबर 2010

खिला होता

सपना रोज़ मै भी देखता हूँ ,
खुश  होता हु और रोता हूँ.
जमाने में बस यह हकीकत है मेरी ,
कभी कंगाल तो कभी राजा होता हूँ .
माना की भवंरा ही खिला सकता है हर कली को,
चेतना मुझ में रहे तो मै भी खिला होता हु.
मुसाफिर सपना मुझे भी दिखा बड़ा बनने का,
फिर देख मै कितना खरा होता हूँ !

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