वक़्त और हालात से जूझना फितरत है आदमी की,
इसने हर सांचे में डलने के हूनर को सीख लिया!
बैर हुआ जब हारने और हराने वाले से
तब साम ,दाम ,दंड ,भेद को सीख लिया!
दुश्मन के दुश्मन को सहारा देकर ,
तुमने जंग-ए-दुश्मन को जीत लिया!
समंदर-ए-जीस्त में तलातुम से कैसा सहमना,
थोड़ी देर उछाल-कूद कर उसी में जो सिमट लिया!
इमितिहान ज़िन्दगी में और भी आयेंगे मुसाफिर,
अगली सोचो अब छोड़ो उसको जो बीत लिया!
फासला ज्यादा नहीं है अब मंजिल से तेरा ,
देख तिनके ने कैसे तेरे हाथ को खिंच लिया !
जंग-ए-ज़ीस्त ना खत्म होने वाली लड़ाई है ,
हैरान हूँ मौत ने आसानी से इसको जीत लिया!
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