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रविवार, 20 फ़रवरी 2011

आज भी जुटे हैं लोग उनको सताने में ,
राज़ थी जो बात उस बात को बताने में |
आशिक और माशूक मिलकर बिछड़े तो क्या हुआ,
तुम गुनाह क्यों करते हो इस बात को छपवाने में |
आशिक और माशूक की कहानी तो एक जैसी है,
कोई तो जलता होगा यंहा बाती और परवाने में | 
मुसाफिर यंहा आया है तो किसे चुनेगा तू शाकी और परवाने में,
एक का आखिरी कतरा भी जान भर देता है ,
दूसरा जान तक गंवा देता है जल जाने में |
मुसाफिर नादाँ है तू सही बात को समझाने में,
दुश्मनी ही बनती है छिपे राज़ को बताने में |

शनिवार, 13 नवंबर 2010

खिला होता

सपना रोज़ मै भी देखता हूँ ,
खुश  होता हु और रोता हूँ.
जमाने में बस यह हकीकत है मेरी ,
कभी कंगाल तो कभी राजा होता हूँ .
माना की भवंरा ही खिला सकता है हर कली को,
चेतना मुझ में रहे तो मै भी खिला होता हु.
मुसाफिर सपना मुझे भी दिखा बड़ा बनने का,
फिर देख मै कितना खरा होता हूँ !

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

ras aa jayega har daur

हम राजदां सही कुछ भी तो नही छुपाते है ,
मुहबत का फलसफा यह सरे-बज्म सुनते है ,
अजनबी सा लगता है हर आशना भी ,
जब नाम अपना ही कहीं से कोई पुकारते है ,
रास आ जाएगा हर गर्दिशे-दौरतुमको भी ,
देखिये तो आप इस राह में कितने बहकते है ,
रश्मे-मुहबत में गमे-उल्फत के किस्से ,
हरेक दिले-मासूम को नाशाद करते है,
और अहसास ही नही जिसे वस्ल की राहत का,
वो क्या खाक मज़ा ज़िस्ते-हिज्र का लुटते है!

बुधवार, 14 जुलाई 2010

हाँ मै अपना बदन बेचूं

हर किसी की नज़र मेरे बदन पर है,
कसूर इन नजरों में किसका क्या देखूं !

मजबूरी-ए-हालतें-दौर में खड़ी होकर मै, 
जमाने में क्या बुरा और अच्छा क्या देखूं !

मेरा भूत पेट सताता है मुझको और फिर मै,
रोता-बिलखता कैसे अपने पेट का टुकड़ा देखूं !

रोज सामना होता है मेरा भूख और गरीबी से ,
फिर ये जमाना क्यों बिगड़े,जब बदन मै अपना बेचूं !

किस्मत का खेल देखिये तो सही हालात ये है ,
मजबूरन बिस्तर पर रोज सुहाग एक नया देखूं !

बार-बार चलना है जब इस राह पर तो यहां ,
चलकर गिरना फिर गिरकर गिरना क्या देखूं !

कुछ पा लिया तो खोने का डर कैसा ,
वक्त गया तो मै वक्त का क्या देखूं !

मेरी मजबूरियों ने मुझे लुटा तो क्या लूटा ,
अपनी हर मजबूरी में मै मजबूर-ए-हालात देखूं !

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

समेट लो उन नसीहतों को

हार-जीत का सिलसला ही मंजिल कोई दिखायेगा,
आओ देखे अगला मंज़र हमको क्या सिखलाएगा!
जाग कर काटी है ना जाने राते कितनी ,
इन आधी-अधूरी रातो का कौन  हिसाब दिलाएगा !
आएगा कही से माँ कि लोरियों का कोई झोखा ,
उन लोरियों का हम सब पर ये कर्म फरमाएगा !
आज भी ताजगी लगेगी माँ कि हर फटकार में, 
 माँ के प्यार को ना बाँट कोई पायेगा !
पिता-पुत्र कि गुफ्तगू के अहसास को महसूस करो ,
समेट लो उन नसीहतों को घर जिनसे बसाया जायेगा !
भाई-भतीजा आस-पड़ोसी सब तो तेरे अपने है ,
तोड़ कर रिश्ता इनसे मिल तुझको क्या जायेगा! 
फसेगी जब कभी मज्ह्धार में नैयेया तेरी 
इन्ही में से कोई एक नाखुदा बन आएगा !

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

समाज कि उठती उँगलियों

एक ही फूल को कई बागों में खिलते देखा है मैंने ,
एक ही फूल पर कईयों को लड़ते देखा है मैंने !
यूँ तो मुझे भी डर है गुलशन-ए- शबाब का,
जिसे रुक-रुक कर बार-बार देखा है मैंने!
इस सच्चाई से मुंह छिपाया जाये भी तो कैसे,
पहली बार किसी दिल को घायल कर के देखा है मैंने !
चेतना आई तो यह हकीकत थी फिर सामने मेरे,
हर युगल पर समाज कि उठती उँगलियों को देखा है मैंने!
तुम खरीदने आई हो या बेचेने प्यार मेरा या अपना ,
बड़े-बड़े खरीदारों को यहां बिकते देखा है मैंने !
एक ही फूल को कई बागों में खिलते देखा है मैंने ,
एक ही फूल पर कईयों को लड़ते देखा है मैंने!


रविवार, 14 फ़रवरी 2010

हकीकत लगेगी

लो अब उठाता हूँ अपने गुनाहों से  पर्दा,
यूँ कोशिस-ए-बेकार में कोई सताए ना मुझे!
तेरे सामने किया ऍब सबसे मै छिपाता था,
अब तेरा अपना भी डर कोई सताए ना मुझे!
वो जब शर्मो-हया से सिकुड़ा था बदन तेरा,
वो अहसास-ए-मुलाकात भी कोई कराए ना मुझे!
यहां दरवाजों और खिडकियों का पहरा नही अब ,
यूँ बेकार की आहटो से कोई डराए ना मुझे!
गर दूर है मुझसे तू  तो इतनी दूर चले जाना,
कि तेरी यादो का झरोखा भी कोई जगाए ना मुझे!